नई दिल्ली 
पश्चिम बंगाल बीजेपी के लिए इतना जरूरी क्यों हो गया है. इसके पीछे की वजह उत्तर प्रदेश की बदली हुई हवा बताई जा रही है. अंदरखाने बीजेपी को एहसास हो चला है कि 2014 का 71 सीटों का इतिहास दोहराना काफी चुनौतीपूर्ण है. ऐसे में भरपाई के लिए एक ही सूबा बचता है. पश्चिम बंगाल. यही वजह है कि अंतिम चरण में केवल 9 सीटें बच जाने के बाद भी पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह शांत बैठने को तैयार नहीं हैं.

जयनगर, दमदम, बारासात, बशीरहाट, डायमंड हार्बर, मथुरापुर, कोलकाता दक्षिण, कोलकाता उत्तर, जाधवपुर. ये नौ सीटें बीजेपी के लिए सपना बन गई हैं. 2014 में भी बीजेपी ने इनपर ताकत झोंकी थी. हालांकि तब अमित शाह रणनीतिकार नहीं थे. मोदी के जादू में भी ये सारी सीटें ममता ने जीतीं. यही बीजेपी की चिंता और उतावलेपन का कारण है कि इसबार क्या होगा. क्योंकि इन सीटों का इतिहास बीजेपी के लिए बहुत उत्साहजनक नहीं है.

इन नौ में से दो को छोड़कर किसी भी सीट पर बीजेपी को दूसरा नंबर भी नसीब नहीं हुआ था. दमदम से टीएमसी के सौगात राय जीते तो दूसरे नंबर पर सीपीएम के असीम दासगुप्ता थे. बारासात में टीएमसी की काकोली घोष जीती थीं तो दूसरे नंबर पर एआईएफबी के मुर्तजा हुसैन थे. बसीरहाट से टीएमसी के ही इदरीस अली जीते थे तो दूसरे नंबर पर सीपीआई के नुरुल होदा थे.

इसी तरह जयनगर से टीएमसी की प्रतिमा मंडल जीती थीं तो दूसरे नंबर आरएसपी के सुभाष नासकर थे. मथुरापुर से मोहन जटुआ जीते तो दूसरे नंबर पर सीपीएम के रिंकु नासकर थे. डायमंड हार्बर से टीएमसी के अभिषेक बनर्जी जीते थे तो दूसरे नंबर अबुल हसनात थे. जादवपुर से टीएमसी के सुगत बोस जीते थे तो दूसरे नंबर पर सीपीएम के सुजन चक्रवर्ती थे.

बीजेपी दो सीटों पर नंबर दो थी. यह सीटें है कोलकाता दक्षिण और कोलकाता उत्तर. कोलकाता दक्षिण से टीएमसी के सुब्रत बख्शी जीते थे तो दूसरे नंबर पर बीजेपी के तथागत रॉय थे. कोलकाता उत्तर से टीएमसी के संदीप बंदोपाध्याय जीते थे तो दूसरे नंबर पर बीजेपी के राहुल सिन्हा थे. ज्यादातर सीटों पर टीएमसी और बीजेपी का फासला 25 फीसदी से ज्यादा का रहा है. सबसे कम फासला 11 फीसदी वोट का था. मतलब चुनौती बहुत बड़ी है.

ममता बनर्जी किसी भी सूरत में अपने किले को बिखरने नहीं देना चाहतीं. और किसी भी सूरत में मोदी ममता के किले में सेंधमारी करना चाहते हैं. इस बार बंगाल में कुछ भी पहले जैसा नहीं है. न राजनीति, न मुद्दे और न ही मतदाता. इस बार जंग मूर्तियों के बीच. एक तरफ ममता बनर्जी की मूर्ति है तो दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी की मूर्ति. 23 मई के नतीजे इन मूर्तियों की ऊंचाई को भी स्थापित करेंगे.

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