नई दिल्ली
लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण से पहले क्षेत्रीय दलों की ताकत को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। माना जा रहा है कि क्षेत्रीय दल अपने सूबों में बड़ी ताकत बनकर उभरे तो उनके बीच अप्रत्याशित जुगलबंदी देखने को मिल सकती है। 
तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर अभी से इस कवायद में जुट गए हैं। वहीं, अपने राज्यों को विशेष दर्जा देने की मांग पर जदयू और बीजद का एक जैसा सुर चुनाव बाद समीकरणों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वाम दलों ने गैर भाजपा किसी भी खेमे में जाने की बात कहकर इस हवा को बल दे दिया है कि जरूरी होने पर क्षेत्रीय दलों की मोर्चेबंदी में वे भी साथ हो सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर नतीजे राष्ट्रीय दलों की मंशा के अनुरूप न हुए और क्षेत्रीय दल चुनाव में बड़ी ताकत बनकर उभरे तो केंद्र में कई नए समीकरण देखने को मिल सकते हैं। 
किंग मेकर या किंग: जानकारों का कहना है कि क्षेत्रीय दलों के क्षत्रप बड़ी महत्वाकांक्षा के साथ चुनाव मैदान में हैं। अगर चुनाव में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो सूबाई क्षत्रप किंगमेकर ही नहीं किंग बनने का भी ख्वाब देख सकते हैं।  

Source : Agency