नई दिल्ली 
उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा-रालोद गठबंधन के बावजूद भाजपा को निर्णायक बढ़त, बिहार में महागठबंधन पर एनडीए का भारी पड़ना यह भविष्य की सियासत के लिहाज से क्षेत्रीय या छोटे दलों के लिए पहाड़ जैसी चुनौती का संकेत दे रहे हैं। जानकारों का कहना है कि खासतौर पर यूपी व बिहार में क्षेत्रीय दलों को चंद जातियों के समूह से बाहर निकलकर व्यापक सोच के आधार पर नया फार्मूला खोजना पड़ेगा। पॉलिसी थिंक टैंक चेज इंडिया के निदेशक मानस नियोग ने कहा कि इन चुनावों में मोदी ब्रांड क्षेत्रीय जातीय क्षत्रपों पर भारी पड़ा। जातियों का व्यूह टूटा है। मोदी की ठोस निर्णय लेने वाले नेता की छवि और करिश्मा ने यूपी, बिहार के क्षेत्रीय दलों का जातीय तिलिस्म तोड़ दिया। इससे साफ है कि चंद जातियों का समूह बनाकर चुनाव जीतना अब बहुत मुश्किल हो गया है।

नए नैरेटिव तलाशने होंगे
जानकारों के मुताबिक जातीय समीकरण पर ध्रुवीकरण व राष्ट्रवाद, परसेप्शन और आशावादी नेतृत्व का हावी पड़ना इस बात का संकेत है कि क्षेत्रीय दलों को भी नए नैरेटिव खोजने होंगे। क्षेत्रीय दल शायद उस स्थिति में ही प्रासंगिक हो सकते हैं जब वे राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर उम्मीदों का प्रतिनिधित्व करें। परसेप्शन की लड़ाई में उन्हें लोगों की आकांक्षाओं को समझना होगा। मानस नियोग के मुताबिक क्षेत्रीय दलों को नई सियासत का मर्म समझना होगा। 

नए समूहों की भूमिका
बिहार में कभी यादव-मुस्लिम समीकरण चलता था, यूपी में भी ऐसे ही समीकरणों के साथ सपा, बसपा जीतते थे। अब पिछड़ों में अति पिछड़ा व दलितों में अति दलित जैसे नए समूह भी चुनाव में अहम भूमिका निभाने लगे हैं। 

राज्यों के समीकरण से बचे रहे
जानकारों का कहना है कि कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों ने अपनी ताकत दिखाई है। क्योंकि राज्यों में उनकी विश्वसनीयता बनी रही। तमिलनाडु में भाजपा विरोधी खेमे में होने के बावजूद द्रमुक अपनी ताकत दिखाने में कामयाब हुई। क्योंकि अन्नाद्रमुक में जयललिता के निधन के बाद पूरी तरह बिखराव हो गया। एनडीए और यूपीए दोनों से समान दूरी बनाने वाले दल तेलंगाना में टीआरएस, आंध्र में वाईएसआर कांग्रेस और ओडिशा में बीजद की कामयाबी इस बात का संकेत है कि अगर राज्यों में मजबूत नेतृत्व और आशा पैदा करने वाला नेतृत्व हैं तो क्षेत्रीय दल प्रासंगिक बने रह सकते हैं।

नए सामाजिक समीकरण तलाशने होंगे
कम्युनिकेशन एक्सपर्ट अनूप शर्मा का कहना है कि चुनाव नतीजों से स्पष्ट है कि जातियां बंधुआ होकर नहीं रह सकतीं। इसलिए सोशल इंजीनियरिंग का नया फार्मूला खोजकर अपना दायरा बढ़ाना यूपी व बिहार में क्षेत्रीय दलों की बड़ी चुनौती होगी। अगर ऐसा नहीं हुआ तो क्षेत्रीय दलों पर राष्ट्रीय दलों की सियासत हावी हो सकती है। या नए विकल्प भी उभरकर सामने आ सकते हैं।

Source : Agency