नई दिल्ली
‘गंगा तव दर्शनात मुक्ति:' अर्थात गंगा का दर्शन मात्र ही मोक्षदायक है। गंगा कलियुग का प्रधान तीर्थ है। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, जब सूर्य वृष और चंद्रमा कन्या राशि के हस्त नक्षत्र में थे, तब गंगा जी का हिमालय से निर्गमन हुआ था। इस बार 12 जून  को गंगा दशहरा मनाया जाएगा।

गंगा का नाम लेने, सुनने, देखने, उसका जल ग्रहण करने, छूने और उसमें स्नान करने से मनुष्य के जन्मों के पाप समाप्त हो जाते हैं। भगवान कृष्ण ने नदियों में अपने को गंगा कहा है। ‘गम् गम् गच्छति इति गंगा' अर्थात गम गम स्वर करती बहती है गंगा। वैदिक एवं पौराणिक ग्रंथों- श्रीमद्भागवत, महाभारत, विष्णुपुराण, स्कन्दपुराण आदि में इसका विस्तार से वर्णन है। पितृदोष से पीडि़त लोगों को गंगा दशहरा के दिन पितरों की मुक्ति हेतु गुड़, घी और तिल के साथ मधुयुक्त खीर गंगा में डालनी चाहिए। 

ब्रह्मा जी ने अपने लोक में वामन अवतार में आए श्री हरि के पैर धोए, जिससे गंगा जी का जन्म हुआ। भगवान राम के पूर्वज भगीरथ ने पूर्वजों को तारने के लिए आराधना की तो ब्रह्मा जी ने गंगा जी को पृथ्वी पर जाने को कहा। तब गंगा जी ने कहा, ‘मेरा वेग कौन थामेगा?' तो भगीरथ शिव की आराधना में जुटे। तब शिवजी ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण किया और फिर गंगा भगीरथ के पीछे-पीछे चलते हुए सनातन धर्म के पांचवें धाम गंगा सागर स्थित कपिल मुनि के आश्रम पहुंची और उनके पितरों को स्वर्ग प्रदान किया। महाभारत में लिखा है कि रोजाना गंगा जल पीने वाले मनुष्य के पुण्य की गणना नहीं हो सकती। हमारे घरों में गंगा का पानी इसीलिए तो रखा जाता है। 
शरीर निरोगी हो तो गंगा दशहरा के दिन गंगा में स्नान, ध्यान तथा दान करना चाहिए। गंगा स्त्रोत पढ़ना चाहिए। इससे दस तरह के पाप नष्ट होते हैं। गंगा पूजा में सभी वस्तुएं दस प्रकार की होनी चाहिए, जैसे- दस प्रकार के फूल, दस गंध, दस दीपक, दस प्रकार के नैवेद्य, दस पान के पत्ते, दस प्रकार के फल आदि, छाता, सूती वस्त्र, टोपी-अंगोछा, जूते-चप्पल आदि दान में देने चाहिए। इस दिन नहाते समय गंगा मैया का इस प्रकार ध्यान करें- ‘गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन सन्निधिं कुरु॥' प्रयाग, गढ़मुक्तेश्वर, हरिद्वार, ऋषिकेश और वाराणसी में श्रद्धालु भारी संख्या में गंगा स्नान का पुण्य कमाते हैं।

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