चक्रव्यूह/सुदर्शन चक्रधर...शेखचिल्ली, शेर और 'जंगली कुत्ते'..!
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बचपन से लेकर अब तक आपने कई बार उस 'शेखचिल्ली' की कहानी सुनी होगी, जिसे डींगें हांकने और शेखी बघारने की आदत थी। वह एक बार जिस डाल पर बैठा था, उसे ही काट रहा था। नतीजतन, धड़ाम से गिर पड़ा. मुझे तो मोदी सरकार की कई आदतें और कार्यप्रणाली इसी 'शेखचिल्ली' की तरह दिखती हैं। क्योंकि देश के बहुसंख्यक हिंदुओं और सवर्णों के जिस वोट बैंक रूपी खाद-पानी से यह मोदी सरकार पल्लवित-पुष्पित हुई है, उसी मजबूत 'वटवृक्ष' की जड़ें वह काटने पर आमादा दिखती है। सुप्रीम कोर्ट ने वर्षों पुराने एससी-एसटी एक्ट के जिन सख्त प्रावधानों को 20 मार्च के आदेश से रद्द कर दिया था, उसे संसद के मानसून सत्र में इस सरकार ने एक संशोधित विधेयक के जरिए पारित करवा कर फिर बहाल करवा दिया। इससे देश का सवर्ण समाज नाराज और कुपित होकर सड़कों पर उतर आया। चार राज्यों में वह हिंसक भी हो गया।

हम किसी भी मुद्दे पर आहूत 'भारत बंद' का समर्थन नहीं करते। क्योंकि इससे जनता और सरकारी संपत्ति सहित जानमाल का भी बड़ा नुकसान होता है। सुप्रीम कोर्ट के 20 मार्च के आदेश के विरोध में देशभर के कई दलित संगठनों ने 2 अप्रैल को 'भारत बंद' करवाया था। तब 10 राज्यों में व्यापक हिंसा हुई थी। फिर इसी गुरुवार को सवर्णों के 'भारत बंद' के दौरान चार राज्यों (यूपी, बिहार, मध्यप्रदेश व राजस्थान) में हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ हुईं। अब 10 सितंबर को पेट्रोल-डीजल की मूल्यवृद्धि के खिलाफ कांग्रेस सहित कुछ विपक्षी दलों ने 'भारत बंद' का ऐलान किया है। मुझे तो यह समझ नहीं आता कि भारत को बार-बार 'बंद' करवाने के लिए आजाद करवाया गया था क्या? पेट्रोल मूल्यवृद्धि सहित अन्य मुद्दों का विरोध जरुर होना चाहिए, लेकिन उसके लिए बार-बार 'भारत बंद' करने की क्या जरूरत है? 

सवर्णों का सवाल है कि हमने 2014 में नरेंद्र मोदी को 'हिंदू हृदय सम्राट' समझकर वोट दिया था, मगर वे अब सवर्णों की ही अनदेखी कर वोट बैंक के लालच में दलितों का पक्ष ले रहे हैं। इनके अनुसार एससी-एसटी एक्ट के पुनः प्रभावी होने से निर्दोष सवर्णों पर अत्याचार बढ़ने लगेंगे। एट्रोसिटी एक्ट 1989 के तहत बिना जांच के ही सवर्णों पर  सीधी गिरफ्तारी की कार्रवाई हो जाती है. इसमें जमानत भी नहीं मिलती। सवर्णों को कोई दलित बेखौफ गालियां भी दे दें, तो भी उनका कुछ नहीं बिगड़ता। इनका कहना है कि सवर्णों के लिए आज तक कोई आयोग नहीं बना. कोई सरकारी योजना नहीं बनी. फिर भी हमने मोदी और भाजपा को वोट देकर 'अपनी सरकार' बनाई. मगर ये 'अपनी सरकार' अपने ही वोटरों के खिलाफ काम करने लगी है. न इसने अयोध्या में राम मंदिर बनाया, न कश्मीर से धारा 370 हटाई और न ही समान नागरिक संहिता (कानून) लाया। 

दूसरी ओर दलितों का कहना है कि किसी दलित या एससी-एसटी ने गौरक्षा के नाम पर किसी सवर्ण की 'मॉब लिंचिंग' नहीं की. कभी किसी सवर्ण महिला को अपमानित नहीं किया। किसी सवर्ण की जमीन नहीं छीनी. उनकी बस्तियों में कभी आग नहीं लगाई। किसी सवर्ण को शादी में घोड़ी से नीचे नहीं उतारा. किसी सवर्ण की मूंछें जबरन नहीं काटी। किसी सवर्ण का धार्मिक बहिष्कार नहीं किया। हजारों वर्षों से हम पर सवर्णों द्वारा ही अन्याय हो रहा है. इसलिए एससी-एसटी कानून जरूरी है।

अब मुद्दे की बात। क्या आपको लगता नहीं कि सत्ता की राजनीति के परिंदे ही हिन्दुओं या सवर्णों को दलितों-मुस्लिमों से लड़ा कर अपने वोट बैंक का 'उल्लू सीधा' करते हैं? ये सफेदपोश ही हिंसा फैलाने में विश्वास रखते हैं। तभी तो 'भारत बंद' करवाते हैं। दरअसल सियासत, दुनिया का सबसे फायदेमंद पेशा है, जिसके लिए हमेशा दो प्रकार की जंग होती है। एक चुनाव जीतने की, दूसरी समाज में कटुता बढ़ाने की. यहां विडंबना यह है कि ऐसी गंदी राजनीति के मैदान में खाई मात के स्याह और खूनी धब्बे मासूमों के खून से धोए जाते हैं। क्या राजनीति की ऐसी ही कुटिल-कलाएं जान-समझकर, आरएसएस प्रमुख डॉ मोहन भागवत ने अमेरिका के शिकागो में हिंदुओं को एकजुट रहने की नसीहत दी है? उनका कहना है, "शेरों ने भी एक साथ रहना चाहिए. क्योंकि अकेले घूमते शेर का शिकार 'जंगली कुत्ते' भी कर देते हैं!" इस बयान में शेर तो उन्होंने हिंदुओं/सवर्णों के लिए कहा, मगर 'जंगली कुत्ते' किसे कहा होगा? इसकी खोज जारी है।
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(कार्यकारी संपादक, दैनिक राष्ट्रप्रकाश एवं चर्चित व्यंग्यकार)

Source : desk