इस अवसर पर राजनारायण की बूढ़ी माताजी और परिवार के लोग भी मौजूद थे

इटारसी। आज जब युवा अपना कैरियर बनाने के लिए पागल हैं, तब 80 के दशक में अपना सबकुछ छोड़कर मध्यप्रदेश के इटारसी से 20 किलोमीटर दूर आदिवासी प्रखंड केसला में आ बसे दो युवकों की कहानी आज  35 साल बाद भी भी वहां के आदिवासीयों के लिए प्ररेणा बनी हुई है, इस अंचल के आदिवासीयों की आवाज बने किसान आदिवासी संगठन की नींव रखने वाले सुनील भाई, एवं राजनारायण भाई और उनके राजनीतिक गुरु किशन जी को उनकी बरसी के अवसर पर उनके आदिवासी साथियों ने याद किया किया और उन्हें  श्रद्धांजली दी। इस अवसर पर राजनारायण की बूढ़ी माताजी और परिवार के लोग भी मौजूद थे। साथ ही होशंगाबाद, हरदा एवं बैतूल जिले से  जुड़े लगभग 50 कार्यकर्ताओं  ने इसके पूर्व दो दिन तक बैठकर आज के कठिन समय में लोकतंत्र और लोगों के अधिकार के साथ-साथ पर्यावरण कैसे बचाना है इसकी भी रणनीति बनाई, और यह तय किया कि आज भले ही राजनारायण, सुनील भाई और किशन जी नहीं हैं. लेकिन उनके विचारों से प्रेरणा लेकर होशंगाबाद, बैतूल, हरदा व खंडवा जिले में यह संघर्ष जारी रहेगा क्योंकि आज भी प्रतिबद्ध व समर्पित कार्यकर्ताओं की टोली मैदान में है।
    सुनील-राजनारायण ने इसी क्षेत्र में आदिवासियों को संगठित कर उनके हक-अधिकारों की मशाल जलाई थी. इस अवसर पर दूर-दूर से चलकर आदिवासी पहुंचे थे. इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल थीं. सुनील भाई भी दिल्ली से जे एनयू से अर्थ शास्त्र में एमए करने के बाद अपनी पी एच डी अधूरी छोड़कर यहां पहुंच गए थे. और राजनारायण इटारसी के रहने वाले थे, जो अपना सबकुछ छोड़ केसला के एक गाँव में बस गए थे। इन दोनों ने आदिवासियों के साथ मिल कर हर तरह की गैरबराबरी और अन्याय व अत्याचार के खिलाफ व बराबरी व सम्मान से जीने के लिए लड़ाई लड़ी।
    सुनील भाई भी दिल्ली से जे एन.यू. से अर्थ शास्त्र में एम.ए.करने के बाद अपनी पी.एच.डी. अधूरी छोड़कर यहां पहुंच गए थे। और राजनारायण इटारसी से अपबा सबकुछ छोड़ 1981 केसला के एक गाँव में बस गए।  इन दोनों ने आदिवासियों के साथ मिल कर हर तरह की गैरबराबरी और अन्याय व अत्याचार के खिलाफ व बराबरी व सम्मान से जीने के लिए लड़ाई लड़ी। किशन पटनायक ओडिशा से थे और बहुत ही कम उम्र में सांसद बने, लोहिया के सहयोगी रहे, प्रखर समाजवादी चिंतक थे। उन्होंने ही देश में पहली बार वैकल्पिक राजनीति की पहल की थी।
    इस अवसर पर उपस्थित लोगों ने कहा कि सुनील भाई, राजनारायण व किशन जी के विचार प्रेरणादायी हैं, जिन पर अमल करना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि है। बचपन से संगठन से जुड़े आदिवासी नेता फागरम ने कहा कि इटारसी के रहने वाले राजनारायण चौबे बेहद साधारण आर्थिक पारिवारिक पृष्ठभूमि के युवा थे, जिन्होंने आदिवासियों के बीच काम किया। उन्हें संगठित किया और उनके हक व सम्मान की लड़ाई लड़ी जिसमें एक के बाद एक कई प्रतिबद्ध कार्यकर्ता जुड़ते गए. सुनील भाई, आलोक सागर व स्मिता जी जैसे कई साथी जड़े. बराबरी, समता व सम्मान की यह लड़ाई आज भी जारी है।
    कार्यक्रम में अनुराग मोदी,  गुलिया बाई, रावल सिंह, मोतीराम तेकाम, राजेंद्र गढ़वाल, विस्तोरी ने भी अपने विचार व्यक्त किए और सुनील-राजनारायण और किशन जी के विचारों पर अमल करने की जरूरत बताई. कार्यक्रम में जीना है तो मरना सीखो, कदम कदम पर लडऩा सीखो, साथी तेरे सपनों को मंजिल तक पहुंचाएँगे जैसे नारे लगते रहे।
    इस कार्यक्रम में राजनारायण की माताजी, भाई संतोष व विजय, दूरदराज के आदिवासी भाई-बहन, संगठन के बसंत तेकाम, मोतीराम तेकाम, गुलिया बाई, अनुराग भाई, फागराम, राजेंद्र गढ़वाल, विस्तोरी, राजीव बामने इत्यादि शामिल थे, इसमें आलोक सागर और जुगन जैसे साथी भी शामिल थे जिन्होंने राजनारायण व सुनील के साथ शुरूआती दिनों से काम किया था, कार्यक्रम का संचालन राजेंद्र गढ़वाल ने किया।